रुचि के स्थान

राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा

समस्तीपुर जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर पश्चिम में अवस्थित पूसा की पहचान पूरे भारत वर्ष में कृषि अनुसंधान की जन्मस्थली के रूप में होती है। 1905 ई0 में तत्कालीन वाईसराय एवं गवर्नर जेनरल लार्ड कर्जन द्वारा पूसा में एक अमेरिकन नागरिक हेनरी फिलिप द्वारा प्रदत्त 30,000 हजार डालर की राशि एग्रीकल्चरल रिसर्च इंन्स्टीच्यूट की आधार शिला रखी गयी। वर्ष 1911 में इस संस्थान का नाम बदलकर इम्पिरियल इंन्स्टीच्यूट ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च रख दिया गया। इस संस्थान द्वारा वर्ष 1916 में गेहूँ के दो प्रभेद पूसा-4 एवं पूसा-12 विकसित किया गया, जिसे विश्व खाद्यान्न प्रदर्षनी में प्रथम पुरस्कार से नवाजा गया था। उल्लेखनीय है कि इस संस्थान द्वारा प्रदेश एवं देश की कृषकों की आवश्यकता के अनुरूप गहन अनुसंधान के फलस्वरूप धान, गेहूँ , तम्बाकू , दलहन, सब्जी, तेलहन एवं मिर्च आदि फसलों की कई उन्नत प्रभेद विकसित किए गये। प्रमुख फसलों पर लगने वाले कीट की पहचान एवं रोकथाम हेतु संस्थान में कार्यरत तत्कालीन वैज्ञानिक एच.एम.लफ्राय, टी.वी.फ्लेयर एवं एच.एस.प्रुथी का योगदान अग्रणी रहा है। इसी प्रकार पौधा रोग पर अनुसंधान कार्य के लिए इस संस्थान की पहचान विष्व स्तर पर हुई। इस दिशा में तत्कालीन वैज्ञानिक इ.जे.बटलर, ड्ब्लू.एम. माकर, एम. मित्रा और वी.वी. मुण्डुकर का योगदान उल्लेखनीय है। फसलों में उर्वरक प्रयोग एवं जल प्रबंधन पर शोध के लिए संस्थान मंे तत्कालीन वैज्ञानिक डा. जे. ड्ब्लू. लेदर का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। उल्लेखनीय है कि संस्थान के विकसित तकनीक के प्रसार के लिए प्रथम प्रकाशित बुलेटिन, पूसा बुलेटिन एवं एग्रीकल्चरल जर्नल ऑफ़ इंण्डिया (1912) की शुरूआत इसी संस्थान द्वारा की गयी थी। वर्ष 1918 में इस संस्थान का नाम बदलकर इम्पिरियल एग्रीकल्चरल रिर्सच इंन्स्टीच्यूट रख दिया गया। दुर्भाग्यवष जनवरी, 1934 में भयानक भूकम्प के कारण इस संस्थान को काफी नुकसान झेलना पड़ा। फलस्वरूप वर्ष 1935 मंे इस संस्थान का स्थानान्तरण नई दिल्ली कर दिया गया। पुनः वर्ष 1936 में मुजफ्फरपुर (मुसहरी फार्म) में अवस्थित संेट्रल सुगरकेन स्टेशन का स्थानान्तरण पूसा कर दिया गया। अपने स्थापनाकाल से ही पूसा स्थित ईख अनुसंधान संस्थान का प्रदेश में गन्ना उत्पादन हेतु उन्नत तकनीक विकसित करने की दिशा में अभूतपूर्व योगदान रहा है। आज पूसा का नाम कृषि अनुसंधान क्षेत्र में देष ही नहीं विश्व के नक्षा पर आ चुका है। यहाँ विभिन्न कृषि संस्थानों एवं उनकी उपयेागिता को देखते हुए राष्ट्र के विकास के लिए राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना 03 दिसम्बर 1977 ई0 को किया गया। जहाँ एक ओर विश्वविद्यालय के विभिन्न संकाय कृषि अभियंत्रण, आधार विज्ञान एवं गृह विज्ञान के अन्र्तगत कार्यरत वैज्ञानिक शिक्षा, अनुसंधान एवं प्रसार के क्षेत्र में अनवरत नई-नई उपलब्धियाँ हासिल कर रहें हैं, वहीं दूसरी ओर वर्ष 2011 में एक अन्तर्राष्ट्रीय अनुसंधान, संस्थान विष्वविख्यात कृषि वैज्ञानिक एन. ई. बोरलोग के नाम पर बोरलोग इंन्स्टीच्यूट की स्थापना जिला एवं राज्य के लिए गौरव की बात है। इसके अलावे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली का एक ईकाई क्षेत्रीय केन्द्र, पूसा बिहार में धान एवं गेहूँ फसल पर शोध कार्य कर रही है।

निषादों की तीर्थस्थली – बाबा अमरसिह स्थान

पटोरी बाजार से लगभग 05 किमी दक्षिण-पूर्व में अवस्थित है निषादों की राष्ट्रीय तीर्थस्थली बाबा अमरसिंह स्थान। षिउरा ग्राम में अवस्थित इस स्थान की महत्ता 16वीं शताब्दी से लगातार बढ़ रही है। यहां प्रतिवर्ष रामनवमी एवं सावन की पूर्णिमा के अवसर पर देष के विभिन्न प्रांतों से निषाद जाति के हजारों श्रद्धालु बाबा का दर्षन कर मन्नत मांगते हैं। गाजे-बाजे ढोल-मान्दर के साथ श्रद्धालु मंदिर में मिटटी के हाथी-घोडे़ एवं दूध चढ़ाकर बाबा का ध्यान करते हैं। दंत कथाओं एवं ग्रामीण बुजुर्गों की जुबानी के अनुसार सदियों पूर्व जब इस क्षेत्र में गंगा की विनाषकारी बाढ़ आई थी तो अचानक एवं जटा-जूटधारी साधु प्रकट हुए और उनकी आराधना से गंगा का पानी उतर गया। बाद में बाबा अमरसिंह अंतधर््यान हो गये। दंतकथाओं के अनुसार बाबा, सोने की जहाज से यहां आये थे जो आज भी मिटटी में दबी पड़ी है। जिसकी जंजीर समीपस्थ कुएं में देखी जा सकती है। यह मंदिर उसी जहाज के ऊपर स्थित है। मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है तथा श्रद्धालु मंदिर में बने एक छेद में दूध डालते हैं । रामनवमी एवं सावन की पूर्णिमा को श्रद्धालु हजारों लीटर दूध चढ़ाते हैं यह दूध कहां चला जाता है किसी को मालूम नहीं। मंदिर परिसर के चारों ओर सैंकड़ो साल पुराना विषाल वट वृक्ष हैं । बताते हैं कि बाबा द्वारा उपयोग किये गये दातुन से यह वट वृृक्ष विकसित हुआ। बाबा के प्रति निषादों के अलावा दूसरे लोगों में भी समान श्रद्धा है। कई लोगों ने मन्नत पूरी होने पर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया तथा कई यात्री निवास बनवाये। रामनवमी से एक माह तक तथा पूरे सावन महीने में यहां बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेष, मध्य प्रदेष, उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़, हरियाणा, उड़ीसा, पष्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेष, तमिलनाडु, कर्नाटक आदि प्रांतों के लोग आकर कई दिनों तक ठहरते हैं। बताते हंै कि कुष्ठ रोगी आज भी बाबा की सेवा के बाद चंगा हो जाते हैं। सरकार द्वारा पटोरी-षिउरा मुख्य मार्ग से मंदिर परिसर तक पहुंचने हेतु पक्की सड़क का निर्माण कराया गया है। बावजूद इसके रामनवमी तथा सावन की पूर्णिमा के मौके पर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यहां पर्याप्त सुविधाएं मौजूद नहीं हैं। फिर भी यहां आने वाले श्रद्धालु सभी कष्टों को भूलकर बाबा के प्रति अपनी श्रद्धा-सुमन समर्पित करते हैं। श्रद्धालुओं के अनुसार बाबा आज भी जीवित परन्तु अंतर्धान हैं।

डोमो का तीर्थस्थल – देवधा

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन जीने का अपना एक अलग ढ़ंग होता है। जिस पर संस्कृति का महत्वपूर्ण प्रभाव होता हैं। उनके सांस्कृतिक गतिविधियों पर कई सिद्ध पुरूष, लोक देवी या देवता एवं स्थान का प्रभाव होता है। समस्तीपुर जिले में निवास करने वाले लोगों के भी कुछ मान्य लोक देवी एवं लोक देवता या सिद्ध पुरूष हैं, जिनके प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित कर लोग अपने जीवन को सफल मानते हैं। अन्य जातीय देवताओं की तरह जिले के हसनपुर क्षेत्र में ष्याम सिंह को डोमों के जातीय लोक देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है। प्रचलित गाथा के अनुसार ष्याम सिंह का जन्म सिंघिया में हुआ था। इनकी मल्ल प्रतिद्वंद्विता देवधा के वंषीधर वामन से थी। लेकिन ष्याम सिंह का पुत्र बालाजी ने वंषीधर को हराकर मार डाला, फिर वंषीधर के पुत्र ने श्याम सिंह और बालाजी को मार डाला। इस प्रकार ष्याम सिंह और वंषीधर वामन की लोकपूजा देवधा में होती है। आज देवधा डोमों को तीर्थस्थल है जहाँ पूरे देष से डोम आकर अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। श्याम सिंह को सूअर के बच्चे की बलि दी जाती है। ष्याम सिंह और बालाजी के अतिरिक्त महकार डोमों में लोकपूजित हैं, इन्हें जातीय देवता भी माना जाता है। माँगने से गन्ने का रस नहीं देने पर महकार ने रस के खौलते कराह में कूद कर अपनी आहूति दे दी थी। यही कारण है कि डोमों के अलावा गन्ना की खेती करने तथा गुड़ उत्पादन करने वाला किसान महकार को लोकपूजा देते हैं। जो इन कार्यो से अलग हैं, वे इनकी पूजा नहीं देते ।

खुद्नेश्वर स्थान

समस्तीपुर जिला मुख्यालय से करीब 17 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम मोरवा प्रखंड के सुल्तानपुर मोरवा में स्थापित हैं- खुदनेश्वर महादेव। यह सामाजिक सौहार्द एवं साम्प्रदायिक एकता का अद्वितीय स्थल है, जहाँ एक साथ शिवलिंग एवं खुदनी बीबी की मजार की पूजा-अर्चना की जाती है। यूँ तो वर्षभर यहाँ श्रद्धालुओं के आने-जाने का सिलसिला जारी रहता है, लेकिन शिवपंचमी एवं शिवरात्री के अवसर पर इस स्थान की अहमियत बढ़ जाती है। आस-पड़ोस के अलावा दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के द्वारा इस मंदिर में जलाभिषेक किया जाता है। वहीं दो दिवसीय मेला का भी यहाँ भव्य आयोजन किया जाता है। मुस्लिम बहुल इलाके में स्थित यह मंदिर सदियों से साम्प्रदायिक एकता, सामाजिक सौहार्द एवं भाईचारा का अलख जगा रहा है। इस मंदिर के निर्माण के संबंध में किंवदंती है कि सात सौ वर्ष पूर्व यहाँ घनघोर जंगल था। इस स्थान का उपयोग मुख्य रूप से मवेशी के चारागाह के रूप में किया जाता था। खुदनी बीवी नाम की एक मुस्लिम महिला अक्सर यहाँ गाय चराने आती थी। एक रोज ऐसा हुआ कि खुदनी बीवी गाय चराकर घर लौटी। गाय को खूँटा से बांधकर जब उसने गाय को दूहने का प्रयास किया तो उसके थन से दूध नहीं निकला। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। एक दिन गाय चराने के क्रम में खुदनी बीवी की गाय उसकी आँखों से ओझल हो गयी। गाय को खोजने के क्रम में उसने देखा की उसकी गाय एक निश्चित स्थान पर खड़ी थी और उसके थन से स्वतः दूध गिर रहा था। खुदनी बीवी ने इसकी जानकारी आस पड़ोस के लोगों को दी। उस विस्मयकारी घटना को अन्य लोगों ने भी अपनी आँखों से देखा। इसके पश्चात् स्थानीय लोगों ने उस स्थान से जंगल झाड़ को हटाकर खुदायी प्रारंभ कर दी। खुदायी के क्रम में उस स्थल पर विशाल शिवलिंग दिखायी पड़ा, जिसकी पूजा अर्चना शुरू कर दी गयी। खुदनी बीवी की मृत्यु प्रश्चात उसकी इच्छानुसार उसके पार्थिव शरीर को शिवलिंग से एक गज दक्षिण में दफना दिया गया। इसके बाद इस स्थान का नाम खुदनी बीवी के नाम पर खुदनेश्वर स्थान रख दिया गया। ब्रिटिश काल में नरहन इस्टेट ने 1858ई0 में इस स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया तथा इसकी देख-रेख हेतु एक पुजारी को नियुक्त किया। आज हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश करता यह अनूठा स्थल बिहार ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व में शांति, सद्भाव व भाईचारे का संदेश देता है। वर्ष 2008 में बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष किशोर कुणाल ने बोर्ड की ओर से आर्थिक सहायता देकर इसे पर्यटन स्थल बनाने की घोषणा कर दी। इसके पश्चात् इस स्थल पर भव्य मंदिर निर्माण तीव्र गति से जारी है।

मोहिउद्दीनगर का किला

मोहिउद्दीननगर मुगलकालीन इतिहास की कहानी बयां करता है। यहां मौजूद खंडहर में तब्दील ऐतिहासिक इमारतों में दफन है बाबर, रूहेले व अफगानी की कहानी। बाबर ने जब 1526ई0 में दिल्ली को अपने कब्जे में लिया तो रूहेले व अफगानी बंगाल और तिरहुत की ओर फैल गये। जब ये बिहार की ओर भागे तो बंगाल के नवाब अलीवर्दी खां ने उन्हें शरण दी। रूहेले के सरदार शमशेर खां, अलीवर्दी खां का मुख्य सैनिक बन गया, किन्तु दुश्मनों द्वारा उसकी हत्या कर दी गई। फलतः अलीवर्दी खां ने अपनी जवाबदेही पूरी करते हुए उसकी बेटी आयशा की शादी शाह मोहम्मद असाक से कराई और उन्हें विदाई में उसे 20 गांवों की जागीर दे दी। उसी भूमि में आयशा बीवी का किला बनाया गया जो आज खंडहर में तब्दील होकर इतिहास को बयां कर रहा है। आयशा बीवी के किले के उत्तर में शाह मोहम्मद मुनौव्वरूद्दीन का मकबरा अवस्थित है। आयशा के शौहर ने ही उनके नाम पर ‘मोहिउद्दीननगर’ का नामाकरण किया। इसके अतिरिक्त हजरत सरवर शाह की खानकाह तथा 1497 ई. में बनी ईरानी शैली की मस्जिद लोदीवंश से ताल्लुक रखता है। आयशा बीवी के किले के अंदर एक भाड़सी (फांसी) घर अवस्थित था जिसके अवशेष वहां देखे जा सकते हैं। बताते हंै कि इसी भाड़सी घर में तब अपराधियों को सजा दी जाती थी। मोहिउद्दीननगर बाजार से उत्तर में अवस्थित किला वाला क्षेत्र पूर्व में ‘सरकार’ कहलाता था। रूहेला अफगान सरदार शमशेर खां की बेटी के वारसान भी पहले यहां के सरकार कहे जाते थे। यहीं पर लगभग 10 फीट ऊँची लाखौरी ईंटों की लम्बी दीवार काफी बड़े हिस्से में फैले हैं। ये किले अब खंडहर के रूप में नजर आने लगे है। किले का दरवाजा भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में नजर आ रहा है। कभी इस दरवाजे से हाथी, घोड़े भी किले में जाते थे परन्तु बाद में किले के भीतरी हिस्से की सुरक्षा के लिए वहाँ रहने वाले लोगों ने एक छोटा द्वार लगवाया। आयशा बीवी की मौत के बाद उनके पोते शाह मोहम्मद हुसैन ने उनकी कब्र को मकबरे की शक्ल दी परन्तु कुछ ही माह बाद बरसात में मकबरे की छत टूट गई। शाह मोहम्मद हुसैन ने जब छत की पुनः मरम्मत करवानी चाही तो उन्हेंोने सपने में देखा कि कोई उन्हें छत बनाने से मना कर रहा है। फलतः छत वैसी ही पड़ी रह गई। पुनः शाह मोहम्मद वाजिद हुसैन का जमाना आया। इन्होेंने मकबरे की छत की मरम्मत करवाई परन्तु दूसरे ही दिन छत टूटकर गिर गई। तबसे अबतक किसी ने भी मकबरे के पुनर्निर्माण का प्रयास नहीं किया। ऐसे ऐतिहासिक धरोहर अब खंडहर में तब्दील हो चुके है ।

चंद्रभवन

पटोरी का चंद्र भवन, जहां छिपा है स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास। भवन मे प्रवेष करते ही अनायास याद आ जातेे हैं सरदार भगत सिंह, चन्द्रषेखर आजाद, बटुकेष्वर दत्त और उनके सहचर रहे टी0 परमानन्द, पं0 सत्य नारायण प्रसाद तिवारी, बालेष्वर सिंह एवं बलदेव चैधरी जैसे क्रांतिकारी सिपाही। अब चंद्र भवन में इनसे जुडे़ संस्मरणों ने दंत कथा का रूप ले लिया है। क्षेत्र के लोग भी अपनी अगली पीढ़ी को उनकी कहानियां सुनाकर अपने को धन्य मानते हैं। चंद्र भवन इस प्रदेष का वह ऐतिहासिक स्थल है जहां स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भगत सिंह और चन्द्रषेखर आजाद सरीखे आजादी के दीवाने वर्षों छिपे रहकर पूरे देष में आजादी के आंदोलन को दिषा देते रहे। इसकी दीवारों में बने सुरंग आज भी इनके छिपने की कहानी कहते हैं। चन्द्र भवन के टी0 परमानन्द क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े थे जबकि पंडित सत्यनारायण तिवारी असहयोग आन्दोलन के समर्थक थे। प्रसंग व संस्मरण बताते हैं कि चन्द्रषेखर आजाद, भगत सिंह, बटुकेष्वर दत्त एवं टी0 परमानन्द पर अंग्रेजी सरकार षूट वारंट जारी कर रखा था। पुलिस को सूचना मिली कि ये चारोे चंद्र भवन में छिपे हैं। इस सूचना पर अंगे्रजी पुलिस ने पूरे चन्द्र भवन को घेर लिया, तभी परिवार के राम खेलावन तिवारी को इस आषय की सूचना मिली और उन्हांेंने अंग्रेजों से कड़े शब्दों में कहा कि तलाषी लेने से पहले घर की महिलाओं को निकल जाने दिया जाय। इसी क्रम में भगत सिंह, चंद्रषेखर आजाद आदि साड़ी पहनकर वहां से निकल भागे। षस्त्र संग्रह के लिए टी0 परमानन्द के नेतृत्व में आजाद एवं सत्यनारायण तिवारी ने टी0 परमानन्द के चाचा के घर में ही डाका डाला था। भगत सिंह को चावल बिल्कुल पसंद नहीं था। उनके लिए टी0 परमानन्द की माँ तीनों समय रोटी बनाती थी तब उनकी मां को सिर्फ इतनी जानकारी थी यह सरदार जी उनके बेटे का मित्र है। जब भगत सिंह और टी0 परमानन्द लाहौर जेल में बन्द थे तो परमानन्द की मां उनसे मिलने लाहौर गई थी। फांसी के बाद जब अखबारों में भगत सिंह की तस्वीर छपी तब परमानन्द की मां को जानकारी हुई कि वह सरदार भगत सिंह था। पटोरी प्रवास के दौरान ये रणबांकुडे़ वर्तमान ए.एन.डी. काॅलेज के पीछे अवस्थित चैर में फायरिंग का अभ्यास करते थे। जोड़पुरा के बलदेव चैधरी जिन्हें फांसी की सजा सुनाई गई तथा मालपुर के कालापानी सजायाफ्ता बालेष्वर सिंह भी इनके साथ रहते थे। समय भले ही गुजर गये हो परन्तु चंद्र भवन से जुड़ी स्मृतियां यहां आज भी जीवंत हैं।